"जहाँ गुरु-चरणों में मिले — सुख, समृद्धि और सिद्धि का त्रिवेणी संगम"
परम पूज्य गुरुदेव
कहते हैं… जब संसार में दुःख बढ़ता है, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में एक ऐसा माध्यम अवश्य भेजते हैं… जो टूटे हुए लोगों को फिर से जीना सिखा सके।
वर्ष 1966… जयपुर की पावन भूमि पर एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसके जीवन का उद्देश्य सिर्फ अपना जीवन जीना नहीं… बल्कि हजारों लोगों के जीवन में आशा का दीप जलाना था।
पूज्य पिताश्री स्वर्गीय श्री दामोदर जी ‘सिद्ध’ और माताजी स्वर्गीय श्रीमती गायत्री देवी के संस्कारों ने बाल्यकाल से ही उनके भीतर आध्यात्म, करुणा और परमार्थ की चेतना जागृत कर दी थी।
उन्हीं माता-पिता की स्मृति में आज जयपुर सांगानेर स्थित निवास “गायत्री भवन” के नाम से जाना जाता है… लेकिन समय के साथ यह केवल एक भवन नहीं रहा… यह हजारों टूटे हुए लोगों की उम्मीद बन गया।
वही बालक… आज सम्पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से पूजे जाते हैं — परमगुरु परम पूज्य श्री कमलेश जी महाराज।
आपके पिताश्री का मूल निवास ग्राम मुहाना रहा, जहाँ आज “सिद्धपीठ धाम” स्थित है। यह केवल एक स्थान नहीं… बल्कि सिद्ध संतों की तपस्या और आशीर्वाद की भूमि है।
यहीं विशाल पशुपतिनाथ शिवलिंग विराजित है, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा ब्रह्मलीन श्री अशोक जी महाराज द्वारा हुई… और यहीं संत बाबा स्रामदास जी महाराज का समाधि स्थल भी स्थित है, जिन्होंने लगभग 250 वर्ष पूर्व समाधि ली थी।
कहा जाता है… आपकी वंश परंपरा में संतों की वाणी में इतनी शक्ति थी कि उनके मुख से निकले शब्द भी सिद्ध हो जाया करते थे… और शायद यही कारण है कि आज भी लोग आपके परिवार को “सिद्ध परिवार” के नाम से जानते हैं।
बाल्यकाल से ही पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी आपका मन संतों के चरणों में ही रमा रहा।
आपके पूज्य ताउजी ब्रह्मलीन संत श्री सीताराम दास जी महाराज (पंचमुखी हनुमान मंदिर वाले) का आप पर विशेष स्नेह और आशीर्वाद रहा… जिन्होंने आपकी आध्यात्मिक यात्रा को जनकल्याण की दिशा दी।
समय बीतता गया… गृहस्थ जीवन, समाज और व्यवसायिक जिम्मेदारियों के बीच भी एक भाव कभी नहीं बदला — “दूसरों के दुःख कम करने का भाव।”
धीरे-धीरे लोग आने लगे… कोई घर की परेशानी लेकर… कोई बीमारी से टूटकर… कोई व्यापार में हानि से परेशान… तो कोई अपने जीवन से ही हारकर…
और वहाँ बैठा एक संत… हर किसी की पीड़ा ऐसे सुनता था जैसे वह उसका अपना दुःख हो।
ना कोई दिखावा… ना कोई चमत्कारों का शोर… बस भगवान के छोटे-छोटे उपाय… और उन उपायों से बदलती हजारों जिंदगियाँ।
परमगुरु श्री अक्सर कहते हैं —
“मनुष्य अपना अच्छा समय स्वयं जी लेगा… लेकिन यदि किसी के बुरे समय में मैं थोड़ा भी काम आ सकूँ… तो इससे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए कोई नहीं।”
शायद यही वह वाक्य है… जिसने लाखों भावनाओं को आपके चरणों से जोड़ दिया।
कई लोग ऐसे थे… जो पूरी तरह टूट चुके थे… लेकिन किसी रविवार “गायत्री भवन” से लौटते समय उनकी आँखों में फिर से उम्मीद थी।
किसी का बिखरता परिवार बच गया… किसी के घर में वर्षों बाद शांति लौटी… किसी माँ की प्रार्थना पूरी हुई… तो किसी युवक को फिर से जीने का साहस मिला।
आज पिछले 30 वर्षों से… हर रविवार… यह सेवा निरंतर चल रही है।
जहाँ लोग केवल समाधान लेने नहीं आते… बल्कि अपनापन पाने आते हैं।
जहाँ कोई निराश होकर नहीं लौटता… जहाँ धर्म केवल पूजा नहीं… बल्कि किसी के आँसू पोंछने का माध्यम बन जाता है।
आपकी विशिष्ट भावना सदैव रही —
“मेरे द्वार से कोई भी व्यक्ति निराश या खाली हाथ न लौटे।”
इसी भावना से प्रारंभ हुई गुरुपूर्णिमा की छोटी-सी दोना प्रसादी आज एक विशाल भंडारे का रूप ले चुकी है।
आपका सिद्धांत सदैव स्पष्ट रहा —
“धर्म और कर्म, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना धर्म के कर्म अधूरा है और बिना कर्म के धर्म।”
आपका उद्देश्य केवल अध्यात्म नहीं… बल्कि समाज को जोड़ना, परिवारों को बचाना, और लोगों के भीतर प्रेम, करुणा और सेवा का भाव जगाना रहा है।
आज “गायत्री भवन” केवल एक स्थान नहीं… बल्कि हजारों लोगों के विश्वास का दूसरा नाम बन चुका है।
जहाँ दुनिया स्वार्थ में व्यस्त है… वहाँ एक संत पिछले 30 वर्षों से हर रविवार दूसरों के दुःख अपने हृदय में लेकर उन्हें मुस्कुराने की वजह दे रहा है…
ऐसे युगद्रष्टा, जनकल्याणकारी, करुणामयी, संत-श्रेष्ठ परमगुरु परम पूज्य श्री कमलेश जी महाराज को कोटिशः प्रणाम।
"जहाँ गुरुदेव की उपस्थिति शब्दों से अधिक बोलती है, और मौन में दिव्य आशीर्वादों का अनुभव होता है।"
हमारा संकल्प एवं सेवा
"हर जीवन में परिवर्तन, हर मन में शांति, हर घर में भक्ति, हर समाज में सेवा।"
"आध्यात्मिक ज्ञान, भजन, सेवा और संस्कारों के माध्यम से सामाजिक उत्थान एवं आत्मिक जागरण।"
दिव्य महोत्सव के प्रमुख आकर्षण
सामूहिक पाठ द्वारा भक्ति और ऊर्जा का संगम
गुरुदेव के चरणों में श्रद्धा और भक्ति का समर्पण
भक्ति संगीत और मधुर भजनों का दिव्य आयोजन
दीपों और भक्ति के साथ दिव्य आरती का आयोजन
सभी श्रद्धालुओं के लिए पवित्र प्रसाद का वितरण
भजन गायन प्रतिभाओं का विशेष मंच
तिथि · समय · स्थल
महाराज जी के पावन दर्शन एवं प्रसादी हेतु अपना नाम सुरक्षित करें।
OPTIONAL PARTICIPATION IN SEVA
प्रवेश पूर्णतया निःशुल्क है। यदि आप स्वेच्छा से योगदान देना चाहें, तो आपकी सेवा महोत्सव के भोग, प्रसाद एवं व्यवस्था में सहायक होगी।
शत-प्रतिशत राशि पूज्य गुरुदेव की सेवाओं में उपयोग होती है · सभी रसीदें तुरंत प्राप्त
गुरु पूर्णिमा 2025 के पावन क्षण
कैसे पहुँचें एवं यात्रा जानकारी
निःशुल्क पार्किंग · प्रवेश द्वार के समीप · सेवादार सहायता उपलब्ध
सांगानेर बस स्टैंड से 2 किमी · ओला/उबर सहज उपलब्ध · रेलवे स्टेशन से 14 किमी
विशेष व्यवस्था · व्हीलचेयर सुविधा · पृथक प्रवेश द्वार
सेवादार: +91 9950202582
श्रद्धालुओं के सामान्य प्रश्न
हाँ, महोत्सव में सभी श्रद्धालु एवं भक्तजन सादर आमंत्रित हैं। प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क है। पंजीकरण केवल सुव्यवस्थित आयोजन एवं संपर्क व्यवस्था हेतु आवश्यक है।
अवश्य। पंजीकरण फ़ॉर्म में आप अपने साथ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दर्ज कर सकते हैं, ताकि समुचित व्यवस्था की जा सके।
महोत्सव दोपहर 12:15 बजे प्रारंभ होगा। कृपया उत्तम बैठक व्यवस्था एवं कार्यक्रम का पूर्ण लाभ प्राप्त करने हेतु प्रातः 11:00 बजे तक अवश्य पहुँचें।
हाँ, महाभोग प्रसादी का लाभ सभी श्रद्धालु भक्तजन प्राप्त कर सकेंगे।
हाँ, प्रत्येक रविवार गायत्री भवन, चित्रकूट कॉलोनी, सांगानेर थाना के पास, जयपुर में प्रातः 10:00 बजे से सायं 4:00 बजे तक दर्शन एवं मार्गदर्शन का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
हाँ, जो श्रद्धालु व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकेंगे, उनके लिए महोत्सव का निःशुल्क लाइव प्रसारण YouTube, Facebook एवं Instagram पर उपलब्ध रहेगा। पंजीकरण उपरांत प्रसारण लिंक साझा किया जाएगा।
श्रद्धालुओं के जीवन परिवर्तन की सच्ची कहानियाँ
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जीवन को दिव्यता से भरें · आत्मा को शांति का अनुभव दें
अभी पंजीकरण करें · दर्शन सुरक्षित करेंबुधवार · 29 जुलाई 2026 · JECC, Hall No. 2, Sitapura, Jaipur
आपका पंजीकरण सफल हुआ। गुरुदेव का आशीर्वाद आप पर सदैव बना रहे। 🙏